सीआरपीसी धारा 161 | पुलिस द्वारा साक्षियों की परीक्षा | CrPC Section- 161 in hindi | Examination of Witnesses by police.

नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका अपने ब्लॉग Mylegallaw.com में, आज हम आपको सीआरपीसी की रोचक धारा के बारे में बताएंगे। इस धारा के अंतर्गत “पुलिस द्वारा साक्षियों की परीक्षा” Examination of Witnesses by police पीड़ित व्यक्ति द्वारा बयान के लिए किया जाता है। अर्थात् जब कभी हमारे अथवा अपने, किसी के साथ कोई घटना घटित होती है, तब हम लोगो ने देखा होगा, पुलिस अधिकारी अथवा ऐसे किसी जांच अधिकारी हमसे सवाल करते हैं, साथ ही पूर्ण मामले को संज्ञान में लेते हुए जांच करते, साथ ही तथ्यो और परिस्थितियों के आधार पर मौखिक पूछताछ की जाती है, जिसे हम पुलिस द्वारा साक्षियों की परीक्षा कहते है। इसे ही हम दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 बयान देना कहते है। आइए जानते है, क्या कहती है धारा 161? और कब लागू होती और कब नहीं लागू होती यह भी बात करेंगे। साथ ही सम्पूर्ण जानकारी आपको इस लेख के माध्यम से देंगे।

CrPC धारा 161 का विवरण

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के अंतर्गत अपराध के तथ्य और मामले की जांच हेतु पीड़ित व्यक्ति से पूछताछ के पश्चात् ही दोषी व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही की जाती है । इसलिए धारा 161 का बयान पीड़ित व्यक्ति को देना अत्यंत ही आवश्यक है। आज हम आपको बताएंगे कब कब और किन किन अपराधों में पुलिस अधिकारी द्वारा पीड़ित व्यक्ति से बयान लिया जा सकता है।

सीआरपीसी की धारा 161 के अनुसार Examination of Witnesses by police.-

पुलिस द्वारा साक्षियों की परीक्षा-

(1) कोई पुलिस अधिकारी, जो इस अध्याय के अधीन अन्वेषण (जांच) कर रहा है या ऐसे अधिकारी की उपेक्षा पर कार्य करने वाला कोई पुलिस अधिकारी, जो ऐसी पंक्ति में निम्नतर पंक्ति का नहीं है जिसे राज्य सरकार साधारण या विशेष आदेश द्वारा निमित्त विहित करें, मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को परिचित समझे जाने वाले किसी व्यक्ति की मौखिक परीक्षा कर सकता है।
(2) ऐसा व्यक्ति उन प्रश्नों के सिवाय, जिनके उत्तरों की प्रवृत्ति उसे आपराधिक आरोप या शास्ति समपहरण की आशंका में डालने की है, ऐसे मामले में संबंधित उन सब प्रश्नों का सही-सही उत्तर देने के लिए आबद्ध होगा जो ऐसा अधिकारी उससे पूछता है।
(3) पुलिस अधिकारी इस धारा के अधीन परीक्षा के दौरान उसके समक्ष किए गए किसी भी कथन को लेखबद्ध कर सकता है और यदि वह ऐसा करता है तो वह प्रत्येक ऐसे व्यक्ति के कथन का पृथक् और सही अभिलेख बनाएगा, जिसका कथन वह अभिलिखित करता है।

Examination of witnesses by police.-
(1) Any police officer making an investigation under this chapter or, any police officer not be do such rank as the state government may, by general or special order, prescribe in this behalf, acting on the requisition of such officer, may examine orally any person supposed to be acquainted with the facts and circumstances of the case.
(2) Such person shall be bound to answer truly all question relating to such case put to him by such officer, other than question the answer to which would have a tendency to expose him to a criminal charge or to a penalty or forfeiture.
(3) The police officer may reduce into writing any statement made to him in the course of an examination under this section; and if he does so, he shall make a separate and true record of this statement of each such person whose statement he records.

[परन्तु यह कि इस उपधारा के आधीन किए गए किसी कथन का अभिलेखन ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक साधनों से भी किया जा सकेगा]

[परन्तु यह और कि उस स्त्री का, जिसके विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 354, धारा 354क, धारा 354ख, धारा 354ग, धारा 354घ, धारा 376, (धारा 376क, धारा 376कख, धारा 376ख, धारा 376ग, धारा 376घ, धारा 376घक, धारा 376घख), धारा 376ड या धारा 509 के आधीन अपराध कारित करने का प्रयत्न किए जाने का अभिकथन किया गया है, कथन, महिला पुलिस अधिकारी या किसी महिला अधिकारी द्वारा अभिलिखित किया जाएगा।]

अन्य न्यायिक रूलिंग

ऐसे अनेक मामले आए हैं जिनमें गवाह न्यायालय में धारा 161 में भी बदल जाते है। जब भी कोई अपराध होता है तो यह पुलिस की जिम्मेदारी होती है कि वह गवाह और पीड़ित की रक्षा करे। पीड़ित और गवाह दोनों की ही कोर्ट में और कोर्ट के बाहर स्थिति पीड़ा जनक रहती है। कई बार इनको धमकियां भी मिलती हैं। कभी सामाजिक बहिष्कार का सामना करना होता है। इनके कारण कई बार गवाह बदलना स्वाभाविक हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा धारा 161 के अंतर्गत बयान को मान्यता दी गई है जिसको लेकर बहुत सी रूलिंग बनाई गई है- जिसमे पीड़ित एवम् गवाह दोनो की सुरक्षा का दायित्व पुलिस अधिकारी को दिया है, फिर भी ऐसे बहुत से मामले है, जिनमे गवाह न्यायालय के समक्ष उपस्थित होते ही बदल गए। साथ ही पुलिस अधिकारी को पुनः जांच करनी पड़ती है।

न्यायमूर्ति एके सिकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने उड़ीसा हाईकोर्ट के 25 जनवरी 2017 के फैसले के खिलाफ अपील की सुनवाई कर रहे थे। इस मामले में आईपीसी की धारा 304 के तहत 5 साल के लिए कारावास की सजा निचली अदालत ने सुनाई थी जिसके खिलाफ हाईकोर्ट ने अपील ठुकरा दी थी।

अपीलकर्ता के वकील ने कोर्ट में कहा कि धारा 161 के तहत घायल व्यक्ति के बयान को मर रहे व्यक्ति का बयान नहीं माना जा सकता। वकील ने इस बारे में लक्ष्मण बनाम महाराष्ट्र राज्य (2002) के फैसले का उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि पुलिस द्वारा धारा 161 के तहत दर्ज किया गया बयान जो कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 के क्लॉज़ (1) के तहत आता है, स्पष्ट रूप से संगत है और इसको स्वीकार किया जा सकता है।

पीठ द्वारा कहा गया
“निचली अदालत और हाईकोर्ट दोनों ने घायल व्यक्ति के बयान को संगत माना है और उस बयान पर भरोसा जताया है।”

“हमने गौर किया है कि कोर्ट ने कहा है कि सीआरपीसी की धारा 161 के तहत दिया गया बयान संगत और मान्य है। इस तरह, हम इस मामले में निचली अदालत द्वारा सुनाए गए फैसले और इस बारे में हाईकोर्ट का जांच अधिकारी द्वारा 5 दिसंबर 1990 को दर्ज किए गए बयान पर भरोसा करने के फैसले में कुछ भी गलती नहीं देख रहे हैं।”

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