आईपीसी की धारा 192 | मिथ्या साक्ष्य गढ़ना | IPC Section- 192 in hindi | Fabricating false evidence. | मिथ्या साक्ष्य के लिए दंड | IPC Section- 193 in hindi

नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका अपने ब्लॉग Mylegallaw.com में, आज हम आपको आईपीसी की रोचक धारा के बारे में बताएंगे। यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के प्रति मिथ्या साक्ष्य गढ़ता है, तो आईपीसी की धारा 192 के अंतर्गत परिभाषित किया गया है, जो व्यक्ति ऐसे कृत्य करेगा, वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 193 के अंतर्गत दंडनीय होगा, आइए जानते है, क्या कहती है ? धारा 192, 193 साथ ही सम्पूर्ण जानकारी आपको इस लेख के माध्यम से देंगे।

धारा 192 का विवरण

भारतीय दण्ड संहिता (IPC) में आज हम आपको महत्वपूर्ण धारा 192 के विषय में पूर्ण जानकारी देंगे। यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को झूठे आरोप में फसाने के लिए, उसको झूठे सबूतों के आधार पर फसाने का प्रयास करता है अथवा षडयंत्र रच कर, उसे झूठे आरोपों में फसाता है अथवा वह किसी झूठे अभिलेख या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख को रचाकर किसी व्यक्ति को झूठे आरोप में लिप्त करता है, तो वह धारा 193 के अंतर्गत दंड का भागीदार होगा। इस लेख के माध्यम से हम आपको दंड, जमानत कैसे मिलेगी इत्यादि की जानकारी आप को देगें।

आईपीसी की धारा 192 के अनुसार –

मिथ्या साक्ष्य गढ़ना

जो कोई इस आशय से किसी परिस्थिति को अस्तित्व में लाता है, या [किसी पुस्तक या अभिलेख या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख में कोई मिथ्या प्रविष्ट करता है, या मिथ्या प्रविष्ट करता है, या मिथ्या कथन अंतर्विष्ट रखने वाला कोई दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख रचता है] कि ऐसी परिस्थिति, मिथ्या प्रविष्ट या मिथ्या कथन न्यायिक कार्यवाही में, या ऐसी किसी कार्यवाही में, जो लोक-सेवक के समक्ष उसके उस नाते या मध्यस्थ के समक्ष विधि द्वारा की जाती है, साक्ष्य में दर्शित हो और इस प्रकार साक्ष्य में दर्शित होने पर ऐसी परिस्थिति, मिथ्या प्रविष्ट या मिथ्या कथन के कारण कोई व्यक्ति, जिसे ऐसी कार्यवाही में साक्ष्य के आधार पर राय कायम करनी है ऐसी कार्यवाही के परिणाम के लिए तात्विक किसी बात के संबंध में गलत राय बनाए, वह “मिथ्या साक्ष्य गढ़ता है,” यह कहा जाता है।

Fabricating false evidence-
Whoever causes any circumstance to exist or [makes any files entry in any book or record, or electronic record or make any document or electronic record containing a false statement]. intending that such circumstance, false entry or false statement may appear in evidence in judicial proceeding, or in a proceeding taken by law before a public servant as such, or before an arbitrator, and that such circumstance, false entry or false statement, so appearing in evidence, may cause any person who in such proceeding is to form an opinion upon the evidence, to entertain an erroneous opinion touching any point material to the result of such proceeding, is said to “fabricate of false evidence.”

मिथ्या साक्ष्य क्या है?

हम सभी जानते है, मिथ्या साक्ष्य, वह सबूत होते है, जो कोई चोरी से अथवा धोखे से एकत्र करके, उसे गलत तरीके से किसी जगह इस्तेमाल करता है अथवा उन साक्ष्यो में हेराफेरी करके उन्हे गलत स्थान पर उपयोग करता है, जहा ऐसा नही करना था। अर्थात् किसी व्यक्ति ने किसी व्यक्ति झूठे दस्तावेज तैयार करके, किसी व्यक्ति के साथ इस प्रकार न्यायिक कार्यवाही में इस प्रकार फसाता है या फसाने का प्रयास करता है, कि वह दोषी है, ऐसे में वह दस्तावेज जो उसने व्यक्ति को झूठे आरोप में फसाने हेतु तैयार किए या कराए है, वह मिथ्या साक्ष्य कहलाते है।

न्यायिक कार्यवाही में मिथ्या साक्ष्य प्रविष्ट करने वाले व्यक्ति को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 193 में दंड का प्रावधान दिया गया है। इस संबंध में कोई व्यक्ति किसी के दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखो में छेड़छाड़ करता है तो वह धारा 193 का अपराधी होगा।

लागू अपराध

न्यायिक कार्यवाही में मिथ्या साक्ष्य प्रविष्ट पेश करने पर दंड।
सजा – सात वर्ष के लिए कारावास या आर्थिक दंड या दोनों का भागीदार होगा।
यह एक जमानती, असंज्ञेय अपराध है और प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।

सजा (Punishment) का प्रावधान

यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को न्यायिक कार्यवाही में झूठे साक्ष्य प्रस्तुत करता है अथवा अन्य कही भी किसी व्यक्ति के झूठे अभिलेख निर्माण करके, गलत तरीके से उपयोग में लाता है तो वह तो वह ऐसे अपराध के लिए सात वर्ष के लिए कारावास या आर्थिक दंड या दोनो का भागीदार होगा।

जमानत (Bail) का प्रावधान

यह अपराध एक जमानतीय, असंज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। यह अपराध जमानतीय होने के कारण आसानी से जमानत मिल सकेगी।
जब भी किसी व्यक्ति को IPC की धारा 193, के अंतर्गत गिरफ्तार किया जाता है, तो वह सत्र न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है। न्यायाधीश द्वारा आसानी से अभियुक्त को जमानत प्रदान कर दी जाती है।
ऐसे मामले में अभियुक्त पीड़ित व्यक्ति के साथ समझौता कर सकता है, यदि समझौता करने योग्य मामला होता है, तब।

हमारा प्रयास धारा 192, 193 की पूर्ण जानकारी, आप तक प्रदान करने का है, अगर आप के पास कोई सवाल हो,तो आप कॉमेंट बॉक्स में कॉमेंट करके पूछ सकते है ।

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