Permanent alimony and maintenance (स्थायी निर्वाहिका और भरण-पोषण)

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा-25 के अन्तर्गत स्थायी निर्वाहिका और भरण पोषण (Permanent alimony and maintenance) को बताता है । स्थायी निर्वाहिका और भरण पोषण पति अथवा पत्नी विवाह विखण्डित होने के उपरान्त अथवा पहले अपनी जीविका चलाने हेतु पति अथवा पत्नी दूसरे पक्षकार से न्यायोच्चित ढंग से न्यायालय व्दारा दिलाया जा सकता है ।

Maintenance (भरण पोषण)

भरण-पोषण का अधिकार संयुक्त परिवार के सिद्धान्त से उत्पन्न होता है । परिवार के मुखिया परिवार सभी सदस्यों के भरण-पोषण संस्कारों की पूर्ति तथा विवाह के खर्चों की पूर्ति के लिये जिम्मेदार होता है। भरण-पोषण के अधिकार उन व्यक्तियों को भी प्राप्त होता है, जो आयोग्यताओं के कारण दाय के अधिकारी नही रह जाते है ।

Permanent alimony and maintenance (स्थायी निर्वहिका और भरण-पोषण)

इस अधिनियम के अधीन अधिकारिता का प्रयोग कर रहा कोई भी न्यायालय, डिक्री पारित करने के समय या उसके पश्चात् किसी भी समय, यथास्थिति, पति अथवा पत्नी व्दारा इस प्रयोजन से किए गए आवेदन पर, यह आदेश दे सकेगा कि प्रत्यर्थी उसके भरण-पोषण और संभाल के लिए ऐसी कुल राशि या ऐसी मासिक अथवा कालिक राशि, जो प्रत्यर्थी की अपनी आय और अन्य सम्पत्ति को, यदि कोई हो, आवेदक या आवेदिका की आय और अन्य सम्पत्ति को तथा पक्षकारों के आचरण और मामले की अन्य परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय को न्यायसंगत प्रतीत हो, आवेदक या आवेदिका के जीवन-काल से अनधिक अवधि के लिए संदत करे और ऐसा कोई भी संदाय यदि यह करना आवश्यक हो तो, प्रत्यर्थी की स्थावर सम्पत्ति पर भार व्दारा प्रतिभूत किया जा सकेगा।
यदि न्यायालय का समाधान हो जाए कि उसके उपधारा (1) के अधीन आदेश करने के पश्चात् पक्षकारों में से किसी की भी परिस्थितियों में तब्दीली हो गई है तो वह किसी भी पक्षकार की प्रेरणा पर ऐसी रीति से जो न्यायालय को न्यायसंगत प्रतीत हो ऐसे किसी आदेश में फेरफार कर सकेगा या उसे उपांतरित अथवा विखण्डित कर सकता है।
यदि न्यायालय का समाधान हो जाए कि उस पक्षकार ने जिसके पक्ष में इस धारा के अधीन कोई आदेश किया गया है, पुनर्विवाह कर लिया है या यदि ऐसा पक्षकार पत्नी है तो वह सतीव्रता नहीं रह गई है, या यदि ऐसा पक्षकार पति है तो उसने किसी स्त्री के साथ विवाहबाह्य मैथुन किया है तो वह दूसरे पक्षकार की प्रेरणा पर ऐसे किसी आदेश का ऐसी रीति में, जो न्यायालय न्यायसंगत समझे, परिवर्तित, उपांतरित या विखण्डित कर सकेगा।

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