Hindu Marriage Act-5 (हिन्दू विवाह अधिनियम धारा-5)

हिन्दू विवाह अधिनियम धारा-5 के अन्तर्गत हिन्दू विवाह के प्रमुख शर्तो के आधार पर विवाह मान्य अथवा अमान्य घोषित किया जाता है । हिन्दू विवाह मे प्रमुख शर्ते दोनो पक्षकारो पर लागू होता है, हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा-5 की शर्तो के आधार पर विवाह ही विवाह संपन्न होने पर ही विवाह मान्य होगा । हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा-5 की शर्ते निम्न प्रकार है-

  • विवाह के समय दोनो पक्षकारों मे से किसी की पत्नी अथवा पति जीवित न हो ।

  • विवाह के समय दोनो पक्षकारों मे से कोई पक्षकार-
  • चित्त विकृति के परिणाम स्वरूप विधिमान्य सम्मति देने मे असमर्थ न हो ।
  • विवाह मे विधिमान्य सम्मति देने मे समर्थ हो, लेकिन इस प्रकार मानसिक विकृति से ग्रसित न हो कि सन्तानोत्पत्ति के आयोग्य हो । 
  • विवाह के दोनो पक्षकारो मे किसी एक को भी उन्मत्ता (पागलपन) का दौरा न पडता हो ।

  • वर की आयु 21 वर्ष एवंम् वधू की आयु 18 वर्ष, अगर पूर्ण होने पर विवाह मान्य होगा ।

  • हिन्दू विवाह के अन्तर्गत विवाह होने वाले दोनो पक्षकारो के मध्य किसी को शासित करने वाली रूढि या प्रथा से उन दोनो के बीच विवाह अनुज्ञात न हो एवंम् पक्षकार निषिद्ध नातेदारी की डिक्रीयो के भीतर न हो अथवा विवाह अमान्य होगा ।

  • हिन्दू विवाह के अन्तर्गत दोनो पक्षकार एक-दूसरे के सापिण्ड न हो, सापिण्ड होगे, तब भी विवाह अमान्य होगा ।

हिन्दू विवाह इन शर्तो को पूर्ण होने ही विवाह मान्य अथवा अमान्य घोषित किया जा सकता है । इनमे से कोई भी शर्त अमान्य होती है तो हिन्दू विवाह विधिपूर्ण विवाह नही माना जायेगा और विवाह अमान्य होगा ।

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